अब आएगा मज़ा विधायकों का…
राजेन्द्र सिंह जादौन भोपाल ब्यूरो
एक विशेष सूत्र के हवाले से मिली जानकारी बताती है कि कुछ जाँच एजेंसियां इन दिनों उन विधायकों की परतें खोलने में जुटी हैं, जिनकी ज़िंदगी का ग्राफ़ पहली बार विधायक बनने के बाद किसी टूटते तारे की तरह नहीं, बल्कि अचानक फूटे ज्वालामुखी की तरह उछला था। यह उछाल इतना तेज, इतना अचानक और इतना संदिग्ध था कि अब उसकी गूँज सत्ता के गलियारों से लेकर जांच एजेंसियों के दफ्तरों तक सुनाई देने लगी है।
दरअसल, राजनीति का यह चमकदार मंच हमेशा से ऐसे किस्सों का गवाह रहा है, जहाँ लोग एक साधारण घर, साधारण कमाई और साधारण जिंदगी से उठकर अचानक लग्ज़री गाड़ियों, करोड़ों की संपत्तियों और आलीशान फार्महाउसों के मालिक बन जाते हैं वो भी सिर्फ पाँच साल के भीतर। जनता पूछती है कि आखिर ऐसा कौन-सा कारोबार है जो सिर्फ विधायक बनने के बाद ही फलता-फूलता है? ऐसे कौन-से कारखाने हैं जिनका धुँआ जनता कभी देख नहीं पाती लेकिन जिनका माल नेताओं के खाते में सीधा करोड़ों में जमा होता जाता है?
यही सवालों की तपिश अब जाँच एजेंसियों की मेज़ों पर धधक रही है। सूत्र बताते हैं कि कई नाम ऐसे हैं जिनकी पहली बार की जीत ही मानो उनके ‘सपनों की खिड़की’ नहीं, बल्कि ‘संपत्ति की सुरंग’ बन गई। पाँच साल में करोड़ों का इज़ाफ़ा, जमीनों का जादुई विस्तार, रिश्तेदारों के नाम पर दर्ज प्रॉपर्टियों की लंबी सूचियाँ, और उन खर्चों का हिसाब जिनकी रसीदें कभी किसी बही-खाते में मिलती ही नही यह सब अब एजेंसियों की नज़र में है।
कहा जा रहा है कि कई जिलों के ऐसे मौन-धनपति विधायक इस समय सबसे ज़्यादा बेचैन हैं। फोन पर कम बोल रहे हैं, मुलाकातें कम कर रहे हैं, और रातों की नींद ऐसे गायब है जैसे चुनाव बाद का उत्साह। कुछ तो अपने पुराने साथी नेताओं से दूरी बना चुके हैं, मानो कोई छाया पीछा कर रही हो। उनकी चिंता यह नहीं कि मामला सच है या झूठ बल्कि यह कि अगर काग़ज़ों की परतें खुल गईं, तो सफाई देने के लिए शब्द कम पड़ जाएँगे।
विधानसभाओं में शपथ लेने वाले हाथों से लेकर जनता के बीच उठाए जाने वाले विकास के दावों तक सबके पीछे अब पहचान की एक नई परीक्षा खड़ी है। यह परीक्षा अदालतों की नहीं, बल्कि उन दस्तावेज़ों की है जो बताते हैं कि विधायक बनने के बाद कितना बदलाव आया, और वह बदलाव कितना जायज़ था।
आगे क्या होगा यह जांच बताएगी। लेकिन इतना तय है कि जिन लोगों ने राजनीति को ‘कमाई का कारोबार’ समझकर दौड़ लगाई थी, उनके लिए अब खेल थोड़ा कठिन होने वाला है। सत्ता की कुर्सी भले भारी रहे, लेकिन जांच की फाइलें उससे कहीं ज़्यादा भारी पड़ती हैं। और यही वजह है कि इस बार असली मज़ा जनता नहीं बल्कि जाँच एजेंसियाँ लेने वाली हैं।