डेढ़र माता पानी दे पानी दे,गीतों की गूंज और इंद्र देव की आराधना… दुदबोली अमावस्या में दिखी आदिवासी संस्कृति की अनोखी झलक

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मेढ़क की टर्राहट, गीतों की गूंज और इंद्र देव की आराधना… दुदबोली अमावस्या में दिखी आदिवासी संस्कृति की अनोखी झल

बुरहानपुर

बुरहानपुर जिले के आदिवासी अंचलों में दुदबोली अमावस्या का पर्व शनिवार और रविवार को पारंपरिक उत्साह और उल्लास के साथ मनाया गया।

 

आदिवासी समाज में “भावई” और “ठूडी” के नाम से प्रसिद्ध यह त्योहार प्रकृति, खेती और आस्था का अनोखा संगम माना जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में सुबह से ही पारंपरिक गीतों, ढोल-मांदल और बच्चों की टोली की गूंज सुनाई दी।

 

आदिवासी मान्यताओं के अनुसार दुदबोली अमावस्या बारिश के देवता इंद्र देव को समर्पित होती है। किसान इस दिन इंद्र देव से पूरे चार महीने अच्छी बारिश और भरपूर फसल की कामना करते हैं।

समाज के बुजुर्गों का कहना है कि यह पर्व मानसून आने के करीब 8 से 10 दिन पहले मनाया जाता है और इसके बाद किसान खेतों में खरीफ फसल की तैयारी शुरू कर देते हैं। मुख्य रूप से मक्का और धान की बुवाई इसी समय की जाती है।

 

त्योहार का सबसे खास दृश्य बच्चों की पारंपरिक टोली रही। बच्चे गांव-गांव घूमते हुए मधुर गीत गाते और सामूहिक नृत्य करते नजर आए। टोली में एक बच्चे को हरे पत्तों से पूरी तरह ढककर सजाया गया, जबकि एक टोकरी में मेढ़क रखा गया।

 

बच्चे घर-घर जाकर नेग मांगते हैं। परंपरा के अनुसार नेग में केवल कच्चा अनाज ही लिया जाता है। ग्रामीणों ने भी उत्साह के साथ बच्चों को अनाज देकर परंपरा निभाई।

इसके बाद बच्चे गांव के बाहर किसी जामुन या आम के पेड़ के नीचे सामूहिक रूप से भोजन बनाते हैं। नेग में मिले अनाज से तैयार भोजन को प्रसादी के रूप में ग्रहण किया जाता है। इस दौरान इंद्र देव से अच्छी बारिश, हरियाली और खुशहाली की प्रार्थना की जाती है।

जहा दुनिया चांद पर पहुंच रही है, मंगल ग्रह तक पहुंच रही, भारत विश्व गुरु बनने जा रहा है।

उसे दौर में आज भी भगवान को मनाने ववालों की कमी नहीं।

आस्था का ऐसा संगम कम देखने की मिलता है।

 

ग्रामीणों का कहना है कि आधुनिकता के दौर में भी यह परंपरा आदिवासी संस्कृति की पहचान बनी हुई है। दुदबोली अमावस्या केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति सम्मान, सामूहिक एकता और खेती-किसानी से जुड़े विश्वासों का जीवंत प्रतीक है।

आदिवासी समाज द्वारा आज भी अपनी परंपराओ को जीवंत रखने के लिए ऐसे आयोजन करते रहते हैं।

यही वजह है कि आज भी आदिवासी गांवों में यह परंपरा पूरे श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाई जाती है।

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